मत कुचलो नन्ही कली- उसे भी खिलने दो
और महकने दो अपने आंगन में
हम सभी ये बात जानते हे कि इस पृथ्वी की रचना में बिना नारी के कुछ भी सम्भव नहीं था इस रचना में जितना योगदान एक नर का है उतना ही योगदान नारी का भी है। क्योंकि जब तक नारी नहीं होगी तब तक एक परिवार की रचना व उसका विकास नहीं हो सकता। क्योंकि गृहस्वी रूपी गाड़ी के दो पहिये है एक नर और दूसरा नारी, इनमें से किसी एक के न होने से वह गाड़ी आगे नहीं बड़ सकती। फिर भी मुनश्य न जाने क्यों एक बेटा ही चहता है यह बेटी नहीं चाहता, क्योंकि वह अब भी एक बेटा और बेटी में फर्क समझता है, क्योंकि वह मानता है कि एक बेटा ही है जो उसके कुल को आगे बड़ा सकता है। बेटी क्या करेगी। वह बेटी के होने पर दु:ख करता है और बेटे के होने पर खुिशयां मनाता है पर ऐसा क्यो र्षोर्षो क्या एक बेटी होना पाप है र्षोर्षो क्या बेटी केा कभी भी वह दर्जा नहीं दिया जायेगा जो दजा्र एक बेटे को दिया जाता है। पर लोग ऐसा क्यो करते हैर्षोर्षो कि जब एक नारी मां बनने वाली होती है तो वह सोनोग्राफी करवाकर यह पता करती है कि एक लड़का है या लड़की, और जब उसे यह पता चलता है कि उसकी कोख में बेटा है तो वह खुिशयां मनाता हैऔर यदि बेटी है तो यह उसे मरवा देती है तब वह बेटी कहती है
गमो से हमारा नाता है - खुशी हमारे नसीब में कहां
कोई हमें पैदा कर प्यार करे - हम इतने खुश नसीब कहां
जब मां अपनी बच्ची को मारती है तो वह ये भूल जाती है कि वह भी बेटी थी उसने भी किसी की कोख से जन्म लिया होगा वह यह भूल जाती है ि कवह एक नारी है और नारी होकर अपनी बेटी को मार रही है। यदि इसी तरह लोग अपनी बेटी को मारते रहे तो इस पृथ्वी पर नये परिवारों की रचना खत्म हो जायेगी। क्योंकि एक नये परिवार की रचना बिना लड़की के सम्भव नहीं है और अगर इसी तरह भू्रण हत्या होती रही तो आगे क्या होगा ये सभी लोग समझ सकते है कि फिर क्या होगार्षोर्षो इस लिये हमें भू्रण हत्या पूरी तरह से बन्द करनी होगी और यह प्रयास करना होगा कि न हम अपनी बेटी को मारेगे और न ही किसी को बेटी मारने देगें। जिनके परिवार में बेटी है। उन्हें अपनी बेटी को एक बेटी से कम नहीं समझना चाहिए जिस घर में बेटी नहीं है उनसे पूछिये कि एक बेटी न होने का दर्द क्या होता है जब एक बेटी घर में हो तो उस घर में खुिशयों की कमी नहीं होती। आज एक बेटी किस प्रकार से एक बेटे से कम है वह किसी भी मोड़ पर एक बेटे से कम नहीं है आज ऐसा कौन सा काम है जो एक बेटा कर सकता है बेटी नहीं कर सकती। आज की लड़की पढ़ लिखकर घर से बाहर निकल रही है और एक बेटे के कन्धों से कन्धा मिलाकर चल रही है लड़की घर के काम कें साथ- साथ बाहर भी काम कर रही है और पैसा कमा रही है वह हर क्षेत्र में अपना पांव रखकर सफलता हासिल कर रही है। आज कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां पर एक लड़की ने अपनी दबदबा न बना कर रखा हो दिन पे दिन लड़कियां अपनी सफलता को हासिल करती हुई आगें बढ़ रही है। आज एक लड़की -लड़के की बराबरी करने में पीछे नहीं हैं आज हर लड़की अपने पांव पर खड़ी हो रही है। वह भी किसी के भरोसे पर रहना नहीं चाहती। इसलिए हमे अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिये और यह सोचना है और निश्चय करना है कि बेटी हमारे घर का चिराग है उसे पैदा करे और उसे एक बेटे की तरह पढ़ा-लिखाकर आगे बढ़ाये। क्योंकि ाज एक बेटा अपनी शादी के बाद अपने मां-बाप को भूलाकर घर छोड़कर अगल रहने भी लगता है तब हम यह कर सकते है
कल तक घर की खुिशया था जो
आज हमें वह छोड़ गया
याद और खामोशी ऐसी उसकी
हम सबसे नाता तोड़ गया
पर एक बेटी अपने मां बाप को कभी नहीं भूलती वह अपने मां-बाप के उपकार याद रखती है वह बेटे की तरह अपने मां-बाप को नहीें भूलाती, और न ही उन्हें दु:ख देती है इसलिए जिनके यहां बेटी है वह अपनी बेटी में ही अपने बेटे को देखे और उसे अपने बेटे की तरह पाल पोसकर बड़ा करे और अपने बुड़ापे का सहारा बनाये। कुछ लोग ऐेसे भी होते है जो अपनी बेटी और बहू में भी फर्क करते है और उसे दहेज के लिए प्रताड़ित रकते है उसे मारते है और कुछ लोग तो अपनी बहू के लिये जलाकर भी मार देते है और यदि वह नहीं मारते तो वह स्वयं अपने आप को खत्म कर लेती है। जब एक लड़की अपने घर से शादी करके ससुराल जाती है-
हुये हावा पीले मेंहदी रचाई
बाबुल के घर से मिली है विदाई
तब उसे बाबुल से दुआ देकर उसकी विदाई करते है-
बाबुल की दुआयें लेती जा
जहां तुझकों सुखी संसार मिले
मायके की कभी न याद आये
ससुराल में इतना प्यार मिले
पर उसके बाबुल को क्या पता था जिस बेटी को उन्होंने इतनी नाजो से पाला -पोसकर बड़ा किया और उसे विदा किया ससुराल में जाकर उसे एक बेटी की तरह नहीं एक बहू की तरह ही रखा जायेगा अगर उसके दहेज मे थोड़ी भी कमी आ जाती है तो उसे हर वक्त परेशान किया जाता है उसे तिल-तिल कर मरने को कहां जाता है क्या वह सास यह नहीं सोचती ि कवह भी कभी बहू रही होगा। उसकी भी तो बेटी होगी अगर उसकी बेटी को भी इसी तरह मारा जाये परेशान किया जाये तो उसके दिल पर क्या बीतेगी।
यहां पर भीा एक बेटी और बहू यह सोचती है कि क्या मैने बेटी होने का पाप किया है र्षोर्षो क्या मुझे कभी भी वह प्यार नहीं दिया जायेगा जो लोग अपने बेटे को देते है। और बेटी भगवान से कहती है-
अब तो किये हो दाता आगे न की ज्यो
अगले जनम मोहे बिटियां न की ज्यो
इसलिये आप सभी से ये निवेदन है कि आप अपनी बेटी को जन्म लेने दे और अगर आपके घर में बहू आती है तो उसे अपनी बेटी की तरह ही रखे । अपनी बेटी और बहू में कोई फर्क न करे। जब हम ये सोचेगें तभी हम इन बुराईयों को दूर कर पायेगो। क्योंकि भू्रण हत्या, दहेज प्रथा दोनों ही बुराईयां समाज के लिए अभिशाप है ये दोनों ही समाज को बर्वाद कर देगे।
Tuesday, February 9, 2010
ओस की एक बून्द सी होती है बेटियां
स्पशZ खुरदरा हो तो रोती है बेटियां
रोशन करेगा बेटा तो एक ही कुल को
दो-दो कुल की लाज को ढोती है बेटियां
हीरा है अगर बेटा तो मोती है बेटियां
कांटों की राह पे ये खुद ही चलती रहेगी
और के लिये फूल ही बोती है बेटियां
विधि का विधान है यही दुनियां की रस्म है
मुठ्ठी में भरे नीर सी होती है बेटियां
स्पशZ खुरदरा हो तो रोती है बेटियां
रोशन करेगा बेटा तो एक ही कुल को
दो-दो कुल की लाज को ढोती है बेटियां
हीरा है अगर बेटा तो मोती है बेटियां
कांटों की राह पे ये खुद ही चलती रहेगी
और के लिये फूल ही बोती है बेटियां
विधि का विधान है यही दुनियां की रस्म है
मुठ्ठी में भरे नीर सी होती है बेटियां
नारी
नारी है एक पे्रम की मूरत।
भोली भाली जिसकी सूरत।।
हर एक कदम पर कश्ट उठाती।
लगती है प्रेम की परिपाती।।
पहले उससे शादी करते।
फिर उसको धोखा दे देते।।
अब क्या इसमें कमी आ गई।
क्या तेरी नियत बदल गई र्षोर्षो
फिर उसी को आदमी जिन्दा जलाते।
अपने लालच को दशाZते।।
पति की कई यातनायें सहती।
कभी कुछ न वो मुंह से कहती।।
आज भी न मिट सका दहेज का दानव।
इसी में फंसा है लालची मानव।।
हे. प्रभू! कुछ समझाओं इसको।
बन्द करो इस दहेज प्रथा को।।
भोली भाली जिसकी सूरत।।
हर एक कदम पर कश्ट उठाती।
लगती है प्रेम की परिपाती।।
पहले उससे शादी करते।
फिर उसको धोखा दे देते।।
अब क्या इसमें कमी आ गई।
क्या तेरी नियत बदल गई र्षोर्षो
फिर उसी को आदमी जिन्दा जलाते।
अपने लालच को दशाZते।।
पति की कई यातनायें सहती।
कभी कुछ न वो मुंह से कहती।।
आज भी न मिट सका दहेज का दानव।
इसी में फंसा है लालची मानव।।
हे. प्रभू! कुछ समझाओं इसको।
बन्द करो इस दहेज प्रथा को।।
Monday, February 1, 2010
सेक्स पर छूट मिलें
समलैगिंगता सवालों के कटघडे़ में खड़ी है। पहले इसे घृणा की दृिश्ट से देखा जाता था आज नज़रिया में परिवर्तन देखा गया है अधिकांश लोग इसमें सहमति दे रहे है कुछ खुलकर कुछ दबे मन से।
किसी ने यह देखा है बच्चे जब छोटे होते है उनमें भी इसी प्रकार के गुण दिखने को मिल जाते है जब वो आपने साथी के साथ खेलते है कुछ समय वितीत करते है या फिर अपने से बड़े या छोटे भाई के साथ भी, घर में , किसी खाली जगह पर यह करते है कुछ लोगों को इसकी आदत हो जाती है कुछ लोग इससे परे हो जाते है, लड़कियों के साथ भी ऐसा होता है। इस आदत से परे हो जाते है वो समलैगिंगता के दायरे से बाहर निकल जाते है जिसको इसकी लत लग जाती है वो समलैगिंग कहलाते है उनको इसकी आदत हो जाती है जैसे लड़की जब तक सेक्स नहीं करती इससे दूर रहती है एक बार सेक्स किया की वो इसकी आदी हो जाती है उसको सेक्स की दरकार बनी रहती है लड़कियां इस भावना को आसानी से छिपा लेती है लेकिन आंखें सब कुछ बायां करती है जिस्म की गर्मी जब सताती है और गर्मी नहीं बुझती तो वो आंखों में उतर आती है जो साफ तौर पर देखी जा सकती हैं।
समलैगिंक सम्बंध आज के दौर की उपज है इसका भी एक कारण है समाज में सेक्स करने पर प्रतिबंध। पहले के दशक में अपनी मर्जी से किसी के भी साथ सेक्स किया जा सकता था कोई प्रतिबंध नहीं था , ज्यों - ज्यों प्रतिबंध लगता गया , बलात्कार , और समलैगिंक जैसे मामलें में बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है, यह बात सत्य है जिस काम के लिए प्रतिबंध लगाया जाता है इंसान वो काम ही करता है यदि उसकों छूट दे दी जाए तो उस काम को करने में अनाकानी करने लगता है। जब सेक्स आसानी से किया जाता था तब इस तरह की कोई घटना घटित नहीं होती थी अब क्या कहें हर जगह प्रतिबंध पे प्रतिबंध लगा हुआ है ये नहीं कर सकते वो नहीं कर सकते।
मेरे नज़रियें से तो सेक्स को छूट दे देनी चाहिए जिसको जिसके साथ सेक्स करना हो वो कर सकताा है पर इसमें कोई जोर जबदस्ती नहीं होनी चाहिए यदि दोनों सहमत है तो कोई बात नहीं वो समभोग कर सकते है। इससे महिलाओं के प्रति हो रही हिंसात्मक घटनाओं में गिरावट अवश्य आएगी ।
फस्ट हैण्ड होनी चाहिए
जिस तरह का बदलाव देखा जा रहा है उससे ताजुब जरूर होता है शायद टेलीविजन का प्रभाव कहें या पिश्चमी सभ्यता का हावी होना, टेलीविजन पर प्यार मोहब्बत की बातें , फिल्मों और एपिसोड में इश्क करते हुए दिखाया जाना इस परिवर्तन के जिम्मेदार हो सकते हैर्षोर्षो संचार क्रांाति के आने के बाद तो इसमें सबसे बड़ा परिवर्तन आया है सभी के पास मोबाइल हो गये है चाहे उसकी आवश्यकता उसको हो अथवा नहीं। 10 -12 साल के लड़के-लड़कियों को मोबाइल की क्या आवश्यता रहती है ये तो उन से अच्छा कोई दूसरा नहीं बता सकता। हमारे जमाने में तो घर में ही फोन की सुविधा नहीं थी आज तो सभी के पास मोबाइल है जिसे रखने में ये अपनी शान समझते है। 24घण्टों मोबाइल लोगों के हाथों में बना रहता है घर में रह जाए तो लगता है कुछ खास चीज रह गई जिसके बिना हमारा काम ही नहीं हो सकता। पहले तो ऐसा नहीं था आदमी बिन मोबाइल के भी अपने कार्य को बखुबी निभाते थे। एक बात और की मोबाइल झूठ कहने वाला उपकरण भी है यह हम सभी को झूठ बोलना सीखता है दूसरों को बेवकूफ बनाने के काम भी करवाता है लोगों को इस पर शक भी नहीं होता। उनकों विश्वास करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रहता।
फिल्मों और टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले दृश्यों को देखकर सभी लोग सेक्स करना चाहते है चाहे लड़का हो या लड़की। वक्त के इस परिवर्तन ने उम्र की तमाम सीमाएं को तोड़ दिया है क्या 14 साल का लड़का- लड़की। वो भी सेक्स के बारे में जानने लगे है सेक्स का आंनद उठाने लगे है। लड़को का क्या है चल जाता है पर लड़कियां का क्या होता होगा, इतनी सी उम्र में सेक्स करना सीख जाते है, लड़कियां जिससे प्यार करती है उसे सब कुछ सौंप देती है अपना समझकर, पर लड़के ऐसा नहीं सोचते वो तो केवल इस्तेमाल करके छोड़ देते है यदि शादी की बात की जाए तो बहाने बनाते है नहीं तो कहते है कि लड़की फस्ट हैण्ड होनी चाहिए उसका किसी के साथ सम्बंध नहीं होना चाहिए, मैं तो एक बात कहूं कि जब तक लड़की की शादी नहीं होती वह फस्ट हैण्ड ही रहती है चाहे शादी के पहले कितनी बार सेक्स क्यों न कर ले। इसका एक उदाहरण किसी गाड़ी से लगाया जा सकताा है आदमी कोई गाड़ी को खरीदने किसी शोरूम जाता है तो गाड़ी को देखता है पसन्द करता है फिर खरीदता है शोरूम से वो गाड़ी जो खरीदता है वो फस्ट हैण्ड होती है चाहे उसकी टेस्ट डाइव कितने लोगों ने क्यों न किया हो, रहेगी फस्ट हैंड़। परन्तु लड़कें अपनी गिरेवान में झांककर नहीं देखते की वो क्या है क्या वो कुआंरे हैर्षोर्षो तो इसका जबाव किसी के पास नहीं होगा। खुद रावण है शादी के लिए सीता की आशा रखते है। ये तो वो ही बात हुई चित भी मेरी, पट भी मेरी, अन्टा मेरे बाप का।
Friday, January 29, 2010
नाच ना आवे आंगन टेड़ा
पिछले दो तीन दिनों से महात्मा गांधी अन्तर्राश्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ख़बर कुछ ब्लॉग पर सुर्खियां बटोर ने काम कर रही है ख़बर पर लोग अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया भी दे रहे है ब्लॉग के माध्यम से अनिल चमड़िया व उनके साथीगण अपनी भड़ास निकालने की पूरी कोिशश में लग हुए है उन्होनें तो कुलपति महोदय पर ही इंजाम लगाया कि वो मेरे पीछे पडे़ है शायद आप विश्व सुन्दरी या जाने माने किसी पार्टी के नेता या फिर चोर तो नहीं, जो वीएन राय उनके पीछे पड़े है अनिल चमड़िया के पीछे पडे़ रहने के अलावा शायद उनके पास और कोई काम नहीं है चमड़िया जी को यह अवश्य ज्ञात होगा कि उनको विश्वविद्यालय में कुलपति महोदय ही लेकर आए थे जब विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में अध्यापकों का अभाव था और वो इस आस से उनकी नियुक्ति भी की थी कि वो छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता के गुण सिखाएगें पर हुआ कुछ अलग हुआ वो अपनी एक कमेटी बनाते रहे, छात्रों को प्रशासन के खिलाफ भड़काने का काम करते रहे। उनके कुछ छात्र तो इतने अच्छे है जो कुलपति, प्रतिकुलपति, विभागाध्यक्ष, िशक्षकगण को गाली देने से भी नहीं चूकते। ये बात सभी के संज्ञान में है पर कहने वाला कोई नहींर्षोर्षो शायद यही िशक्षा आपने छात्रों को दी है दे भी रहे है कि अपने से बड़ों को गाली दें उनका अनादरण करें। बहुत अच्छा पाठ पढ़ाया है आपने।
अनिल चमड़िया जिस प्रकार का आरोप लगा रहे है यदि उन पर गौर फरमाया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी होने में जरा-सी देर भी नहीं लगेगी। आप वीएन राय पर आरोप लगा रहे है कि स्वजातीय लोगों की बातों में आकर आपकी नियुक्ति को निरस्त किया है यदि ऐसा ही है तो आप इतने माह तो इस विश्वविद्यालय में कैसे और किस आधार पर टीके रहेर्षोर्षो यदि जातिगत ही मामला है तो विश्वविद्यालय में आपकों भी पता होगा कि दलित छात्रों की संख्या कितनी है जहां तक पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग दोनों से तो ज्यादा ही होगी, और तो और कुछ विभाग तो ऐसे भी है जहां तो सामान्य वर्ग का एक भी छात्र नहीं है तो इसको आप क्या कहेगें दलितवादी निणर्यर्षोर्षो आप तो यहां तक भी कहते है कि यहां पढ़ रहे लड़कों के दबाव में आकर वीसी ने अपनी नियुक्ति की थी, कहीं ऐसा सुना है किसी विश्वविद्यालय के छात्रों के दबाव में आकर किसी की नियुक्ति हुई है तब तो छात्र यदि चाहेगें कि किसी आठ पास या पांचवी फेल को टीचर बना दिया जाए तो क्या वो टीचर बन जाएगा, चाहे उसने सम्बंधित फील्ड में कांट्रीव्यूशन क्यों न किया हो, विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की नियुक्ति उसकी योग्यता के आधार पर वीसी या सम्बंधित नियुक्त कर सकते है पर किसी प्रोफेसर/रीडर/लैक्चरार को नियुक्त नहीं कर सकतार्षोर्षो जब तक वो टीचर बनने की पूर्ण योग्यता नहीं रखतार्षोर्षो यदि आपको लगाता है कि आप बिना डिग्रीधारक पैमाने पर फिट के आधार पर प्रोफेसर बनाये जाने चाहिए तो आपने मित्र और साथीगण जो अभी एम.ए. कर रहे है या फिर एम.फिल/पी-एचडी कर रहे है उनको भी सलाह दें कि वो पढ़ाई छोड़ दे न्तब भी वो प्रोफेसर बन जाएगेंर्षोर्षोर्षोर्षो मेरा यहा दो बार र्षोर्षोर्षोर्षो लगाने का तात्पर्य केवल इतना है कि सभी लोगों को पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए इसमें मैं भी शामिल हूं क्योंकि मैंने भी बी.कॉम पास किया है मुझें पी-एचडी नहीं करनी चाहिए क्योंकि पी-एचडी में पूरे-पूरे दो तीन साल के बाद, तब भी संभावनाएं ही है कि टीचर बनूगां या नहीं, पर आप तो बिना डिग्री के पैमाना पूरा कर रहे है। रही बात अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर पराए शहर में आने की, यह तो धन का मोह ही है जब पैसे के खातिर इंसान अपना जिस्म, हत्या, चोरी-डकैती-लूटपात यहां तक की अपने मां-बाप को भी बेच देता है तब आपनी बसी-बसाई घर-गृहस्थी को छोड़कर आना कौन सी बड़ी बात हैै।
जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) की बात आप कहे रहे है उसमें 18 सदस्य हैं और केवल 8 सदस्यों ने वीसी के कहने पर आपको निकाल दिया। यानि आपके कहने का मतलब यह भी है कि ईसी में जितने भी सदस्य है वो नासमझ/अज्ञान है सारा ज्ञान आप में कूट-कूटकर भरा हुआ है। आपका तो यहां तक कहना है कि वीएन राय के कामकाज के तरीके के कारण विश्णु नागर ने ईसी से इस्तीफा दे दिया है इसका तात्पर्य यह है कि कुलपति महोदय को आप से सीखना पडे़गा कि किस प्रकार काम किया जाता है तब तो वीएन राय जी को प्रोफेसर न बनाकर अपनी जगह कुलपति बनना चाहिएर्षोर्षो रही बात विश्णु नागर जी के इस्तीफे की कि किस कारण से उन्होंने ईसी से इस्तीफा दिया। ये तो उन से अच्छा और कोई नहीं बता सकतार्षोर्षो
विश्वविद्यालय में जिस प्रकार की गतिविधियां इस समय चल रही है यदि प्रशासन नेे जल्द ही कोई उचित कदम नहीं उठाए तो विश्वविद्यालय की गरिमा को घूमिल होने से कोई नहीं बचा सकता।
यह लेख किसी भावेश में आकर नहीं लिखा गया है जो देख रहा हंू दिख रहा है वो ही लिखा है , थोड़ा आप भी गौर कीजिए, मेरे हिसाब से तो पत्रकारिता किसी एक पक्ष को ध्यान में रखकर नहीं की जाती, जब तक दोनों पक्षों को सुन न लिया जाए तब तक अपने विचार नहीं देना चाहिए। मैंने अनिल चमड़िया के द्वारा लिखा लेख व वीएन राय दोनों के लेख पढ़कर ही यह लेख लिखा है।
ैीन्दप ेपदही
ैीन्दपेपदहीऋ125/लंीववण्पद
अनिल चमड़िया जिस प्रकार का आरोप लगा रहे है यदि उन पर गौर फरमाया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी होने में जरा-सी देर भी नहीं लगेगी। आप वीएन राय पर आरोप लगा रहे है कि स्वजातीय लोगों की बातों में आकर आपकी नियुक्ति को निरस्त किया है यदि ऐसा ही है तो आप इतने माह तो इस विश्वविद्यालय में कैसे और किस आधार पर टीके रहेर्षोर्षो यदि जातिगत ही मामला है तो विश्वविद्यालय में आपकों भी पता होगा कि दलित छात्रों की संख्या कितनी है जहां तक पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग दोनों से तो ज्यादा ही होगी, और तो और कुछ विभाग तो ऐसे भी है जहां तो सामान्य वर्ग का एक भी छात्र नहीं है तो इसको आप क्या कहेगें दलितवादी निणर्यर्षोर्षो आप तो यहां तक भी कहते है कि यहां पढ़ रहे लड़कों के दबाव में आकर वीसी ने अपनी नियुक्ति की थी, कहीं ऐसा सुना है किसी विश्वविद्यालय के छात्रों के दबाव में आकर किसी की नियुक्ति हुई है तब तो छात्र यदि चाहेगें कि किसी आठ पास या पांचवी फेल को टीचर बना दिया जाए तो क्या वो टीचर बन जाएगा, चाहे उसने सम्बंधित फील्ड में कांट्रीव्यूशन क्यों न किया हो, विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की नियुक्ति उसकी योग्यता के आधार पर वीसी या सम्बंधित नियुक्त कर सकते है पर किसी प्रोफेसर/रीडर/लैक्चरार को नियुक्त नहीं कर सकतार्षोर्षो जब तक वो टीचर बनने की पूर्ण योग्यता नहीं रखतार्षोर्षो यदि आपको लगाता है कि आप बिना डिग्रीधारक पैमाने पर फिट के आधार पर प्रोफेसर बनाये जाने चाहिए तो आपने मित्र और साथीगण जो अभी एम.ए. कर रहे है या फिर एम.फिल/पी-एचडी कर रहे है उनको भी सलाह दें कि वो पढ़ाई छोड़ दे न्तब भी वो प्रोफेसर बन जाएगेंर्षोर्षोर्षोर्षो मेरा यहा दो बार र्षोर्षोर्षोर्षो लगाने का तात्पर्य केवल इतना है कि सभी लोगों को पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए इसमें मैं भी शामिल हूं क्योंकि मैंने भी बी.कॉम पास किया है मुझें पी-एचडी नहीं करनी चाहिए क्योंकि पी-एचडी में पूरे-पूरे दो तीन साल के बाद, तब भी संभावनाएं ही है कि टीचर बनूगां या नहीं, पर आप तो बिना डिग्री के पैमाना पूरा कर रहे है। रही बात अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर पराए शहर में आने की, यह तो धन का मोह ही है जब पैसे के खातिर इंसान अपना जिस्म, हत्या, चोरी-डकैती-लूटपात यहां तक की अपने मां-बाप को भी बेच देता है तब आपनी बसी-बसाई घर-गृहस्थी को छोड़कर आना कौन सी बड़ी बात हैै।
जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) की बात आप कहे रहे है उसमें 18 सदस्य हैं और केवल 8 सदस्यों ने वीसी के कहने पर आपको निकाल दिया। यानि आपके कहने का मतलब यह भी है कि ईसी में जितने भी सदस्य है वो नासमझ/अज्ञान है सारा ज्ञान आप में कूट-कूटकर भरा हुआ है। आपका तो यहां तक कहना है कि वीएन राय के कामकाज के तरीके के कारण विश्णु नागर ने ईसी से इस्तीफा दे दिया है इसका तात्पर्य यह है कि कुलपति महोदय को आप से सीखना पडे़गा कि किस प्रकार काम किया जाता है तब तो वीएन राय जी को प्रोफेसर न बनाकर अपनी जगह कुलपति बनना चाहिएर्षोर्षो रही बात विश्णु नागर जी के इस्तीफे की कि किस कारण से उन्होंने ईसी से इस्तीफा दिया। ये तो उन से अच्छा और कोई नहीं बता सकतार्षोर्षो
विश्वविद्यालय में जिस प्रकार की गतिविधियां इस समय चल रही है यदि प्रशासन नेे जल्द ही कोई उचित कदम नहीं उठाए तो विश्वविद्यालय की गरिमा को घूमिल होने से कोई नहीं बचा सकता।
यह लेख किसी भावेश में आकर नहीं लिखा गया है जो देख रहा हंू दिख रहा है वो ही लिखा है , थोड़ा आप भी गौर कीजिए, मेरे हिसाब से तो पत्रकारिता किसी एक पक्ष को ध्यान में रखकर नहीं की जाती, जब तक दोनों पक्षों को सुन न लिया जाए तब तक अपने विचार नहीं देना चाहिए। मैंने अनिल चमड़िया के द्वारा लिखा लेख व वीएन राय दोनों के लेख पढ़कर ही यह लेख लिखा है।
ैीन्दप ेपदही
ैीन्दपेपदहीऋ125/लंीववण्पद
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